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Sunday, August 31, 2025

जय जय श्रीराधे

गत वर्ष राधाष्टमी महोत्सव पर राधाजी की कृपा हुई कि जो युगलस्वरूप के चित्र जी देखकर उनके वर्णन में कुछ पंक्तियाँ जुड़ गईं। हिंदी-ब्रजभाषा मिश्रित शब्दों में प्रथम प्रयास है। छन्द-बद्ध तो नहीं हैं, भाषाशुद्धि में, शब्दों के चयन में अनेक भूलें भी कदाचित रह गईं होंगीं... पर सहसा जो लिख दिया यहाँ भी सहज रही हूँ। 
ऐसी कृपा हो, कोई शब्द मन में आएँ, वह प्रभुसेवा में आएँ। 🙏

राधाने जो कियो मान, कान्हाने सो बेला जान
निज कर बेनी गूंथ आनन्द को दियो दान ।
आरसी में दिखे नैन, पियारी के सुखचैन
एक टक जुगों तक दरस होते दिन रैन ।
पलक जो झपकत, बिरह से डरपत
चन्दर को बरजे, पिय बदर में छिप मत ।
सोभित देख जुगल सुगंधित भए कमल 
धन है जीवन आज लाडली प्रकटी भूतल ।।
-  भैरवी🙏
#राधाष्टमी 🌷

(राधाजी जो रूठ गईं, कान्हा ने समय परखकर साथ बैठ उनके बाल सँवार वेणी बना दी, ऐसा आनंद दिया। राधाजी को दर्पण में कृष्ण के ही नयन दिख रहे हैं जो उनके जीवन का सर्वोच्च सुख है। दिन रात अनिमेष नेत्रों से उन्हीं के दर्शन करते युग भी बीत जाएँ। तभी जब भी पालक झपक जाती है, वह क्षणार्ध मात्र में भी दर्शन का विलंब लगने से विरह का भय लगता है; और वे पूर्णचंद्र को आज्ञा करती हैं, बादलों के पीछे छुप न जाना, अंधेरा न हो जाए। इस शीतल प्रकाश में युगल स्वरूप की शोभा देख कर रात्रि को भी कमल खिलकर सुवासित हो गए हैं, क्यों कि जीवन धन्य है जो इस काल में लाडली राधिका जी इस धरती पर प्रकट हुई हैं।)
🌷🌷🌷

- BhairaviParag



Wednesday, September 20, 2017

Raindrops!

बारिश की बूंदें...कितनीं?


कुछ ठहरें गुलाब की दो पँखुड़िओं पर
चमकें हीरों सी नई किरणों में
महकते पलों को मन के कोनों से
फिर से जगा दें उतनीं

दो हाथ फैलाए खिड़की से
भीग जाएँ फिर थामे अंजलि में
वो भर भर जाएँ, छलके फिर
बहें मिलने धरती से उतनीं

चलते राहों पर गहराये
बादलों से गरज कर बरस पड़े
कोरा न रहे तन और मन को भी
भीगा कर हरा दें उतनीं

झरने लगें बहने कल कल कल
भर जाएँ ताल एक हो जल थल
आकाश भी मिल जाए धरती को जब
क्षितिज को धुंधला दें उतनीं

बारिश की बूंदें...उतनीं 
Raindrops...Hands-full of them
 -BhairaviParag

Monday, May 16, 2016

सूरज कहीं नहीं जाता


People change, Situations change, Opinions change. But there's something that does not change...ever. Unshakeable, unperturbed, untouched by impermanence. Call it Knowledge, Love, or Divine...If you have ever truly known it, it is yours forever...You never lose THAT!

सूरज कहीं नहीं जाता

घिरें बादल भले, वर्षा भी तो है उसी का उपहार
जानते हम वह रहा चमकता घन के उस पार
धरती की तृषा बुझे जैसे ही 
प्रकाश से फिर नहलाता 
सूरज कहीं नहीं जाता

भले ही मुँह फेर ले धरती उससे रात अँधेरे में
क्षितिज के पार ठहरा मूर्त धैर्य सा हम जब घूमें फेरे में
तम से ज्योति की ओर दृष्टि हो जैसे ही 
नए दिन को फिर फैलाता 
सूरज कहीं नहीं जाता

जो भी है अमूल्य आलोकित जीवन में तुमने पाया 
भले छूट जाए कुछ क्षण कुछ दिन जब हो मन भरमाया 
अगर जाना है उसे मन से, भले ही अब है नकारा
जानो अनन्त समय तक हर पल वो है तुम्हारा 

भीड़भाड़ में हाथ से छूट कभी 
कंकड़ सा ठोकर भी खाता
धूल की परतें हट जाएँ 
रत्न फिर हाथ आ जाता
 
...सूरज कहीं नहीं जाता

- BhairaviParag

Quote of the moment:
"...Once you blossom then you never wither. If you move ten steps ahead, you may go back eight steps but you can never go back all ten steps..." ...(Full text here)
-Sri Sri Ravi Shankar

Wednesday, April 27, 2016

वलय

Situations do not leave a mark on a mind that is one with the vast creation, just as no images lie permanent on a mirror. Disturbances, if any, only last for a few moments, like ripples in water...and as time flies, they only add to the richness of understanding of life.

शांत जल एक सरोवर में
उस में साफ़ स्पष्ट
दिख रहा
प्रतिबिम्ब आकाश का 
हर प्रहर बदलता, बिना छाप छोड़े
हवा से ज़रा सा कभी कभी कांपते 
उस पानी को सूर्य की किरणें चमका रहीं 
जैसे रत्न झिलमिलाते रहते

नीरव है वातावरण
बस कुछ पंछी ही उड़ रहे
 
तभी कोई आया टहलता 
उसी निःशब्दता की तलाश में

शायद आदत नहीं थी उसे
जल से आकाश से एक हो कर 
बस एक हो कर कुछ देर बैठने की
उठाया एक
पत्थर किनारे से
क्या देखना था...कितनी दूर जाता है?
पता नहीं...बस उठाया
तानकर फैका पानी में

...छपाक... 
जा गिरा सरोवर में
पानी उड़ा थोडा
उड़ती बूँदें भी ज़रा सी चमकीं धुप में
फिर मिल गयीं ताल में
मछलियाँ चौंकीं, तैर दूर गयीं
पक्षी भी उड़े एक आवाज़ दे कर
जल में कुछ वलय बने
फ़ैल कर कुछ बड़े बन
फिर मिल गए समतल में
झिलमिलाते आसमानी दर्पण के 
 
हाँ, एक बात तो है
वह पत्थर भी तो गीला हो गया
जब गिरा जल में
बस गीला ही नहीं
डूब गया है पूरा ही
पानी में, बैठ गया तल में

अब पानी की मछलियाँ
खेलेंगी आसपास, तैरती हुईं
बनाएँगी घर उसी पत्थर के पीछे
इस तालाब का छोटा सा
एक हिस्सा ही बन गया
वह पत्थर जो गिरा
एक बार....छपाक से
 
-BhairaviParag

Friday, November 27, 2015

धूप में एक फूल

सूर्य खिला है आसमान में 
धुप सुनहरी है लाया 
विश्व सारा दिख रहा है उजला
साफ़ साफ़ हर कण दिखलाया

उद्यम में लगा जग सारा
प्रकाश को गले लगाया
सुवासित श्वेत शतदल सुमन
कहीं कुञ्ज में था, दिख न पाया 

तप्त हुआ वातावरण
लौ का जैसे बादल लहराया 
पुष्प दल से नमी लगी उड़ने
रंग भी ज़रा सा कुम्हलाया 

पर वही गर्म हवा
कभी शीतल पवन थी, जब था साया
जो जाना था ह्रदय से 
उसे अनदेखा न कर पाया

तृषा कई दिनों की थी बुझी
जब पवन था वर्षा लाया 
उन्हीं पंखों पर आया था जल
बन ओस किरणों को था चमकाया

समय बदल गया है, देखो,
बात हमारी भी मानो 
संभल जाओ, जी जाओगे
पत्तों ने बहुत समझाया

दाह लगा हुआ था पर
शीतलता भूल न पाया
फूल कभी कंटक बन न पाया
क्या करे, मुरझा गया 

-BhairaviParag 



Friday, June 26, 2015

चरणचिह्न

एक विनम्र प्रयास - 
कवि श्री 'सुन्दरम् ' द्वारा सन १९५८ में  रचित गुजराती कविता 'चरणचिह्न' का भावानुवाद

रूप का मैं रसिक तो रहा पर तृषा मेरी अरूप के लिए
भज रहा मैं अविरत मूर्त है जो कभी मिले अमूर्त इसलिए
शब्दों को पुकार पुकार मैं नित्य ढूंढ रहा अशब्द ही
सदा चलता रहता मिल जाये कदा मुझे स्थिरता कहीं

रे आओ आओ मुझ पास ऐ उस पार के निवासी
धन्य हो वो एक पल बस तेरी मिल जाए हे प्रवासी
सिमटी रहे भले सकल तेरी कला, मेरी बस याचना
एक दृष्टि तेरी मुझ ओर हो जाए, यही है प्रार्थना

यह जीवन-मृत्यु की इस जग में बनी सुन्दर फुलवारी
यहाँ पुष्प और कंटक के द्वंद्व की नित्य अद्भुत यारी
यहाँ पृथ्वी पर देवों का अमृत घट कभी दिखा ना
ना ही यहाँ देखी कभी स्वर्गपुष्प की चिरंजीव माला

मैं तो रात रात भर तारे अगिनत देखता जागूँ
बस इस बेला में चरणचिह्न ही तेरे मैं मांगूँ 
(मूल कविता 'सुन्दरम्' के काव्यसंग्रह प्रियंका से)
-BhairaviParag


 

Thursday, June 11, 2015

कुछ पल साथ तेरे

मुस्कुरा उठेगी मेरे सामने एक रोज़
तेरी तस्वीर एक सितारा,
चाँद बन कर जगा हूँ...
कुछ पल साथ तेरे बीता पाऊं यारा,
हर दुआ में यही मैं मांगने लगा हूँ

तुझ से फिर मिलने की चाह दिल में है ऐसे
धड़कन के साथ ज़िन्दगी जुड़ी जैसे
हर साँस ऐसी, तेरी खुश्बू से महके
उस एक झलक के सहारे जीने लगा हूँ...
कुछ पल साथ तेरे...

बस एक बार मिल लो, फिर चाहे खो जाना
एक नज़र देख लोगे, संजो लूंगा खज़ाना
गर हाथ मेरा एक पल तुम थाम लोगे
जन्नत के बदले नसीब ऐसा चाहने लगा हूँ...
 कुछ पल साथ तेरे...

उस एक पल में मैं सारी उम्र जी लूँगा
हर गम से नज़ाद पाने तरकीब सीख लूँगा
रूह मेरी जिन आँखों में देखी है मैंने
उन से आँखे मिलाने तरसने लगा हूँ... 
कुछ पल साथ तेरे...

एक आवाज़ दे दो, या इस राह गुज़रो
या फिर भीड़ में ही सुकून बन के संवरो
थकने लगी आँखें, न होतीं अब नम ये
खुली पलकों से सपने मैं देखने लगा हूँ
हर चेहरे में अब तुम्हें ढूँढने लगा हूँ...

कुछ पल साथ तेरे बीता पाऊं यारा
हर दुआ में यही मैं मांगने लगा हूँ। 
 -BhairaviParag

Friday, March 06, 2015

होली है :-)

होली की अनेक बधाइयाँ 


उड़ाए गुलाल केसुड़ा  उमंग से 
हर ओर नवरंग की बदली बुनी झीनी
ढोल तांसा बजे धकतिनछिनछिन
नाच गा होली की बधईयाँ दिनी
जल के कुण्ड कई हर कोने में
मन भर सब ने डुबकियाँ लीनी
होली है...पुकार गूंजी बुलंद और 
सारी धरती आज हुई जल भीनी
छोटे छोटे बालक सब आँगन उमड़े 
टोली जैसे बंदरो की साथ हो लीनी
लाल पीले हरे नीले जामुनी श्यामल
केसरी रंग की पोटलियाँ कई कीनी
छपछपाक पानी में कूदे, दौड़ आ 
नन्ही सी सखी से पिचकारी छीनी
हंसी किलकारी मीठी सी छलकी
जब जल की सर में हुई बाला भीनी
फिर छुप कर रंग दिया अचानक
चपलता से लौट कैसी चौंका दीनी
समय का भान न रहा किसी को
फिर उदर ने भोजनकी याद कीनी
गुजिया ठंडाई हरेभरे चने पतासे
माँ ने मीठे पुरण से पूरियां भर दीनी
 हर साल यह एक दिन रंग खेलन
इसकी मौज छबियों में भर लीनी

Monday, February 02, 2015

एक घाव - A wound

 एक घाव 



गुजराती भाषा के वरिष्ठ साहित्यकार 'कलापी' की उपरोक्त कविता का हिंदी में विनम्र भावानुवाद प्रस्तुत है, ...आशा करती हूँ यह प्रयास कविता-प्रेमिओं को पसंद आएगा

पत्थर कठोर उस पंछी पर फैका कैसे, अरेरे, फैक तो दिया 
छूटा हाथ से अ र र र र …तब  दिल एक धड़कन चूक गया 
अरेरे - लगा उस कोमल दिल पर , साँस विहंग की भारी हुई
तरु से नीचे आ गिरा… पंख शिथिल हुईं अब... न उड़ पायीं 

प्रिय मेरा पंछी - हाँ , मेरा ही तो है - मेरे ही हाथ से तड़प रहा 
जल के छींटे कुछ न लौटा रहे होश, दिल अब मेरा भी रो रहा
कैसे उठता? ज़ख्म उस दिल पर क्रूरता से इसी हाथ ने किया
कैसे उठता? कोमल हृदयी वह, यह जान कर भी तोड़ दिया

अहा! आँखे ज़रा तो खुलीं....दर्द क्या उसका कम हुआ होगा?
जान तो बचेगी ना? पर मृत्यु की गति कौन बता पाया, भला?
जीवन उसने क्या जिया…अहा! रहा मधुर गीत गाता सदा 
बगिया के रास मधुर फल चखता, चहकता रहता फुदकता

अरे अरे...किन्तु अब मेरे पास वह शायद फिर कभी न आएगा
आयेगा तो भी भय से काँपता, फिर दूर उड़ जाना चाहेगा
अरेरे श्रद्धा जो अस्त हो गयी, वह किसी काल फिर न आये
जो लगे घाव हृदय पर, भूलने का सामर्थ्य क्या कोई पाये?

Translation in Hindi by BhairaviParag
Original Gujarati kavita -Ek Gha - By Kalapi





Sunday, February 01, 2015

मैं बारिश में गीला गीला हो गया

घर से निकला, माँ ने छाता नहीं दिया था
पता नहीं था, बादल ने क्या सोच लिया था 
ठंडा ठंडा मैं, वो नीला नीला हो गया 
मैं बारिश में गिला गिला हो गया 


बारिश की बूँदें मेरी नाक पर नाचतीं 
कुछ तो तूफानी, कान के भीतर भी जातीं 
पाँव मेरा कीचड से चिपकिला हो गया 
मैं बारिश में गिला गिला हो गया 

पेड़ सारे नए हरे भरे हो गए 
पानी में नहाकर साफ़ सुथरे हो गए
रास्ता सारा ज़रने सा रसीला हो गया
मैं बारिश में गिला गिला हो गया 

घर पहुंचा तब तक एक छींक आ गयी 
स्कूल में कल छुट्टी होगी, उम्मीद छा गयी
पर हल्दी वाले दूध से फिर स्फुर्तीला हो गया 
मैं बारिश में गीला गीला हो गया
- BhairaviParag 
(Written in partnership with my 9 y o son, 
who gave the original idea and many lines, too)


Wednesday, September 17, 2014

Poetry from the wild

A picture says a thousand words, just as few words can paint a picture.

Seeing some compelling visual poetry in these pictures from the wildlife, words came in couplets, to accompany them.

Sharing a small selection of my captions for these beauties.


Those eyes...Hypnotic

नज़र मिल जाए एकबार फिर वो हट सकती नहीं जाने कितनी बातें यह न बोल कर भी कह रहीं दिल से इन आँखों की तसवीर मिट सकती नहीं

The extravagance of colours...

सातों रंग बिखेरता बड़ी शान से जब वह उड़ा 
आसमाँ में सूरज भी एक पल थम दिया मुस्कुरा  





The royal calmness...

ऐसा क्या सुन्दर स्वप्न रहा, न आँख खुलीं न तन चंचल शुभ्र धवल शीत हिमवर्षा में शांत सुन्दर व्याघ्र अचल



The lightness of being...

उड़ जाना है अगले पल यह फूल झड़ जाएगा कल मीठा रस लेकर, ख़ुशी के रंग तू बिखेरता चल


And the coolness of homecoming.

सारी दुनिया घूम ली, ऊंचाईयाँ हर छू लीं

लौटा, आई घरकी याद, आज एक अरसे के बाद
भूला चेहरा दर्पण में दिखा, शांत शीतलता मिली

Sunday, September 07, 2014

मेरे घर चाँद क्यों नहीं आता?


मेरे घर चाँद क्यों नहीं आता?
क्या वह मुझे नहीं पहचानता?
रोज़ रात चमकता  रहता 
जैसे हो मुझे वह आवाज़ देता 

पर जब काले बादल आते 
उनके पीछे क्यों छिप जाता 
आँख मिचौली खेलते उन तारों से 
क्या मैं  हूँ  कम  टिमटिमाता ?

पूरी समझ उसे खा जाऊंगा...
क्या ऐसा है मुझे समझता?
या फिर मेरे घर की बिल्ली 
की म्याऊँ से है वह डरता?

जब वह छोटा पतला दिखता 
उसकी ध्यान रखूं, मन करता 
और जब पूरा गोल-मटोल हो,
लगता उस पर कन्हैया खेलता 

मुझे भी खेलने क्यों न बुलाता?
ऐसे क्यों है मुझे सताता?
कितना हूँ मैं उसे मनाता 
फिर भी रहता मुझे चिढ़ाता 

मेरे घर चाँद क्यों नहीं आता? 

- BhairaviParag 
(In teamwork with my dear son)





Thursday, July 31, 2014

श्रावण

श्याम घन छाए अम्बर पर,
चहु ओर छाई हरियाली,
टप टप थिरकत जल की बूंदें,
पत्तों की हथेली पर देत ताली

शीतल पवन झुला रहा झूला,
झूल रही बाला भोली भाली,
ठेक देत तृण भरी धरती पर,
फिर झूले ऊंचे, हँसे, उड़े निराली

भीग गया तन और अंतर मन,
नाच उठी अल्हड़ मतवाली
पनिहारी,चलत जो जा रही पनघट,
थम कर, खो गयीं अँखियाँ दो काली

श्रावण की प्रिय घटा ऐसी छाई,
मन का हर संशय हो रहा खाली
जा, गयी आँगन वह सांवरे के,
लता रही अब घेरे वृक्ष की डाली

-BhairaviParag

Friday, July 25, 2014

हर रंग के गीत सजायेंगे

एक हँसी, एक आस, आँखों की नमी
एक आंधी, एक सागर, खुला आसमाँ
तुम से कुछ न छुपायेंगे

किस पुकार को सुन उठी मन में सिसक,

किस ताल को सुन गए पाँव थिरक,
किन आँखों में दिखी अपनी ही ज़लक...
हर याद से नाता निभाएंगे

वह फूल खिला, उसने क्या कहा,

जो हवा चली, क्या इशारा कर गयी,
बूंदों ने बरस कुछ गुनगुनाया,
तुम्हें भी गा कर सुनायेंगे...

खुली किताब में सजे जो शब्द,

फूलों सी महक फैला हैं रहे,
बरसेंगे वो फूल, समेट के उन को
नव रंग कई हार बनायेंगे

जिसने है बनायी ये दुनिया सकल,

जिसने इस मन को बनाया कोमल,
जिसने किया लिखना यह गीत सरल,
उसे ही कर अर्पण मुस्कायेंगे

Wednesday, July 16, 2014

जियो

जियो तो ऐसे जियो, दिल से
जो कोई मिले बोल उठे...
"क्या जी रहे हो यार
जीवन हो तो हो ऐसा

बादल घिरे हैं घने हर तरफ
कहाँ से चमकी यह किरण
जिसका आइना बना तुम्हारा चेहरा
उजाला वो भी फैला रहा

कुछ कह दिया तुम्हें किसी ने
मैंने भी सुना, था कुछ रुखा सा
तुम रूठे तो नहीं, बरसा रहे
फिर भी अपनापन ही उतना

उत्सव हो जिस दिन,
तुम्हारे साथ और खिल उठा
मेला लगा हर दिन खुशियों का
क्यों खोजें मीत मिलने को बहाना

खुल के ली साँस, गलती जो की भी, तो नयी
भरी उड़ान सितारे छूने को
न भी मिले जो तारे, चाँद तो छुआ
'काश यह किया होता' तो न  कहा

बाँटा जो था मीठा हमेशा
जो कुछ परोसा गया खट्टा तीखा
साँसों से हल्का कर दिया,
आँखों से लगा अपना लिया"

और फिर एक दिन… 

"तुम जा रहे लम्बे सफ़र पर
पता है खुश ही रहोगे हर जहाँ
मिलेगा कोई, जिस से बात करते
खिलेगा दिल, पहचान लेंगे तु ही लौट आया"

-BhairaviParag 

Loved this :)

सोचती हूँ

सूरज सी रोशन हर दिशा ज़मीं पर,
फिर आँखें सितारे क्यों ढूँढती हैं...
झिलमिला जाएं कभी कहीं वह,
एक पल चमक कर, क्यों झुकती हैं

आंधी सी तेज़ हवा चंचल चलती,
बह न जाए उसमें एक कागज़ कहीं...
क्या लिख दिया उस कागज़ में भला,
मन की धड़कनें तेज़ क्यों चलती हैं

संजोए हीरे सा अनमोल एक राज़,
है तो ज़रूर दिल को उस पर नाज़,
छलक न उठे क्यों उसकी रौशनी...
सिमटी सी ही दिल में क्यों रहती है

-BhairaviParag

पलकों पे रहते हैं

सुना कई बार बड़ी सुन्दर है इन आँखों की चमक...
राज़ ना है छुपा, पर फिर भी आज बताते हैं.
कदम जब पड़ते, ज़मीन पर क्यों फूल बिछ जाए,
क्यों हँसी आँखों से हर एक पल छलकी जाए

धुप सुनहरी, छाँव शीतल, क्यों सम ही लगती,
नींद आए जब, क्यों सपने मधुर गुनगुनाएं
बस इशारे ही कैसे मन की बात बता जाते,
सारा संसार कैसे क़दमों में सिमट जाए

क्यों है विश्वास सा, की सब है जैसा होना था,
क्यों साथ साहसों की राह निकल पड़ते हैं,
बादलों से हलके क्यों ना उड़े आसमानों में... 
एक दूजे की पलकों पे रहा करते हैं!

- BhairaviParag   :)

उस तारे को

सितारा तुम दूर
एक हो लाखों में
प्रकाश हल्का शीतल
देते रहते, छंटता अंधेरा
ऐसा क्यों लगता
तुम हो अपने से
हाथ बढाऊँ जो
मिल जाओगे
प्यारे नाज़ुक फूल से
सजाकर रखूं मंदिर में
पूजा करता रहे यह मन
दिशा कल्याणी सदा
दिखाते रहो तुम
झिलमिलाते मुस्कुराते
हमेशा की तरह

-BhairaviParag 

Monday, June 02, 2014

भारत चला सिंह की चाल


गए दिन अब संशय के
मन ले दृढ विश्वास
नयी शुरुआतों की ओर
भारत चला सिंह की चाल


कृतज्ञता साहस और निष्ठा
आत्म श्रद्धा की निधि साकार
सहस्त्र शुभ संकल्प लिए
भारत चला सिंह की चाल


वीर धीर नेता को मान्य कर
जनता ने आशीष दिया
विजय तिलक से कर सुशोभित
भारत चला सिंह की चाल


साथ सारे बढ़ेंगे मिलकर
स्नेहबंध से मिलझुल कर
वसुधा कुटुम्ब ही यह वचन देता
भारत चला सिंह की चाल


जगद्जननी दुर्गा, सरस्वती
लक्ष्मी की कृपा रहे अपार
भावपूर्ण आर्त प्रार्थना कर
भारत चला सिंह की चाल


तेज ऐसा झगमग फैला
देखे आज सारा संसार
गौरव पुनःस्थापित करना अब
भारत चला सिंह की चाल


-Bhairavi Parag Ashar

This one came on May26, 2014 , Obvious reason :)




तुम्हारा नाम मुस्कान रखा है


गम हो या ख़ुशी, ख़ूबसूरत है ज़िन्दगी,
सँवर गयी, रब का जैसे साथ मिला है
जब नाम लूँ, एक लहर सी आती है
तुम्हारा नाम मुस्कान रखा है

गम के घेरे में भी एक सुकून की झलक
जैसे तूफ़ान में मुस्काते तिनके की नज़ाकत
या ज्यों आंधियों में रौशन एक दिये की मासूमियत
जब दिखे, लगता है रब ने तेरा जिक्र किया है

न कहूँगी कभी, रूठ मत जाना...
जानती हूँ यह रिश्ता पुराना है ।
होठों पे जब से तुम्हारा नाम सजाया है
सौभाग्य मेरा, हर श्वास पर उत्सव मनाया है ।

-BhairaviParag