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Sunday, August 31, 2025

जय जय श्रीराधे

गत वर्ष राधाष्टमी महोत्सव पर राधाजी की कृपा हुई कि जो युगलस्वरूप के चित्र जी देखकर उनके वर्णन में कुछ पंक्तियाँ जुड़ गईं। हिंदी-ब्रजभाषा मिश्रित शब्दों में प्रथम प्रयास है। छन्द-बद्ध तो नहीं हैं, भाषाशुद्धि में, शब्दों के चयन में अनेक भूलें भी कदाचित रह गईं होंगीं... पर सहसा जो लिख दिया यहाँ भी सहज रही हूँ। 
ऐसी कृपा हो, कोई शब्द मन में आएँ, वह प्रभुसेवा में आएँ। 🙏

राधाने जो कियो मान, कान्हाने सो बेला जान
निज कर बेनी गूंथ आनन्द को दियो दान ।
आरसी में दिखे नैन, पियारी के सुखचैन
एक टक जुगों तक दरस होते दिन रैन ।
पलक जो झपकत, बिरह से डरपत
चन्दर को बरजे, पिय बदर में छिप मत ।
सोभित देख जुगल सुगंधित भए कमल 
धन है जीवन आज लाडली प्रकटी भूतल ।।
-  भैरवी🙏
#राधाष्टमी 🌷

(राधाजी जो रूठ गईं, कान्हा ने समय परखकर साथ बैठ उनके बाल सँवार वेणी बना दी, ऐसा आनंद दिया। राधाजी को दर्पण में कृष्ण के ही नयन दिख रहे हैं जो उनके जीवन का सर्वोच्च सुख है। दिन रात अनिमेष नेत्रों से उन्हीं के दर्शन करते युग भी बीत जाएँ। तभी जब भी पालक झपक जाती है, वह क्षणार्ध मात्र में भी दर्शन का विलंब लगने से विरह का भय लगता है; और वे पूर्णचंद्र को आज्ञा करती हैं, बादलों के पीछे छुप न जाना, अंधेरा न हो जाए। इस शीतल प्रकाश में युगल स्वरूप की शोभा देख कर रात्रि को भी कमल खिलकर सुवासित हो गए हैं, क्यों कि जीवन धन्य है जो इस काल में लाडली राधिका जी इस धरती पर प्रकट हुई हैं।)
🌷🌷🌷

- BhairaviParag



Friday, June 26, 2015

चरणचिह्न

एक विनम्र प्रयास - 
कवि श्री 'सुन्दरम् ' द्वारा सन १९५८ में  रचित गुजराती कविता 'चरणचिह्न' का भावानुवाद

रूप का मैं रसिक तो रहा पर तृषा मेरी अरूप के लिए
भज रहा मैं अविरत मूर्त है जो कभी मिले अमूर्त इसलिए
शब्दों को पुकार पुकार मैं नित्य ढूंढ रहा अशब्द ही
सदा चलता रहता मिल जाये कदा मुझे स्थिरता कहीं

रे आओ आओ मुझ पास ऐ उस पार के निवासी
धन्य हो वो एक पल बस तेरी मिल जाए हे प्रवासी
सिमटी रहे भले सकल तेरी कला, मेरी बस याचना
एक दृष्टि तेरी मुझ ओर हो जाए, यही है प्रार्थना

यह जीवन-मृत्यु की इस जग में बनी सुन्दर फुलवारी
यहाँ पुष्प और कंटक के द्वंद्व की नित्य अद्भुत यारी
यहाँ पृथ्वी पर देवों का अमृत घट कभी दिखा ना
ना ही यहाँ देखी कभी स्वर्गपुष्प की चिरंजीव माला

मैं तो रात रात भर तारे अगिनत देखता जागूँ
बस इस बेला में चरणचिह्न ही तेरे मैं मांगूँ 
(मूल कविता 'सुन्दरम्' के काव्यसंग्रह प्रियंका से)
-BhairaviParag


 

Monday, June 08, 2015

It's beautiful, feeling blue

Every experience adds meaning to our life,though we may not realize it then. The beauty lies in discovering it. Feeling Blue then turns to feeling the depth that sensitivity brings, once the pain melts away


It's beautiful, feeling the sky


of vast understanding
of infinite possibilities, yes, to fly

of wet heavy raindrops
blending with a ray of light
that splits to reveal a bow
its glorious colours true

of hiding million stars
in the light of the day
of letting them shine
only when it's dark

It's beautiful, felling blue, 
like the sky

It's beautiful, feeling the ocean


of deep meanings,
of million waves, yes, even turbulent

of nestling many islands
lush green with sweetest water
where to play in the sands
and basking in sun new

of hiding million pearls
in the closed oyster shells
of letting them reveal
themselves to true seeker

It's beautiful, feeling blue,
like the ocean 

It's beautiful, feeling The Blue

 

when the mind is in the refuge 
of the melodious flute 
of the sunny robes
of feather light many-hued
with heart soft as butter.
Yes, It's beautiful then,
feeling, even blue.
 - BhairaviParag





Friday, July 25, 2014

हर रंग के गीत सजायेंगे

एक हँसी, एक आस, आँखों की नमी
एक आंधी, एक सागर, खुला आसमाँ
तुम से कुछ न छुपायेंगे

किस पुकार को सुन उठी मन में सिसक,

किस ताल को सुन गए पाँव थिरक,
किन आँखों में दिखी अपनी ही ज़लक...
हर याद से नाता निभाएंगे

वह फूल खिला, उसने क्या कहा,

जो हवा चली, क्या इशारा कर गयी,
बूंदों ने बरस कुछ गुनगुनाया,
तुम्हें भी गा कर सुनायेंगे...

खुली किताब में सजे जो शब्द,

फूलों सी महक फैला हैं रहे,
बरसेंगे वो फूल, समेट के उन को
नव रंग कई हार बनायेंगे

जिसने है बनायी ये दुनिया सकल,

जिसने इस मन को बनाया कोमल,
जिसने किया लिखना यह गीत सरल,
उसे ही कर अर्पण मुस्कायेंगे