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Sunday, January 10, 2021

Kuchh to bataa Zindagi

इस ब्लॉग पर संस्कृत में यह प्रथम प्रस्तुति है। कविता लिखने में रुचि तो है ही, मूल गीत के लय और भाव के उपयुक्त शब्द चुनने का खेल, और एक पंक्ति में लाघव बनाए रखने से मिलता संतोष। ट्विटर पर एक संस्कृत छात्रा ने कल कोई  गीत - "कुछ तो बता ज़िन्दगी" गुनगुनाते हुए उसी गीत की पहली कड़ी संस्कृत में ट्वीट कर दी, तो उस गीत को खोज लिया और आगे लिखने का मैंने भी प्रयास किया।  पहले भी एक ङ्ओओ कड़ियाँ किसी न किसी  गीत की लिखती आई हूँ, इस बार हँसीखेल में पूरे गीत का अनुवाद हो गया। अब तक मैं व्याकरण भली-भाँति नहीं सीख पाई तो त्रुटियाँँ हो सकती हैं, पर वह तो लिखते लिखते अभ्यास से ही जाएंगी। इसी तरह गीतों-कविताओं के अनुवाद करते करते कभी नए वाक्य संस्कृत में सरलता से लिखना भी सीख ही जाऊंगी। 

तो वह गीत यहाँ सुनें - Zindagi Kuch Toh Bata - और साथ एक अनुवाद भी देखकर प्रतिक्रिया अवश्य दें।

दा प्रणयपरिवेष्टितः

कस्मिंश्चित् वीथिकान्ते

अहं वर्णयामि तव हस्ते

नामं मम तव नामान्ते

नतलोचन त्वं तदा हे

गतसङ्कोच भवतु

मम भुजशीखरे संविशतु

कपोल तव जीवनम्

किञ्चित् तु वद जीवन...

स्वसङ्केतं जीवन...


तारकित रात्र्यां पठिष्यामः

सम्भूय भवतः पत्रं  

एकस्मिन् हस्ते कम्पितः

सावशेष पृष्ठं रिक्तं

किञ्चित् व्याक्रोशतु भवत्

ईषत् विप्रलपामि अहम्

मा कुप्यतु भोः जीवन

किञ्चित् तु वद जीवन...

स्वसङ्केतं जीवन...


(त्वम् वर्तसे ततः जीवामि अहम्

त्वम् वर्तसे ततः जीवामि अहम्

त्वम् वर्तसे ततः च व्योमन् 

त्वम् वर्तसे ततः धरा मम)


कश्चन मार्ग

कश्चित पथ हि

ददातु माम्

काचित् सञ्ज्ञाम्  

किञ्चित् तु वदऽऽ जीवन...

स्वसङ्केतंऽऽ जीवन...


Sunday, October 08, 2017

એક સરોવર ની વાત

સરોવરનું શાંત સ્થિર જળ...જાણે દર્પણ
સાફ સ્પષ્ટ દેખાતું એમાં
પ્રતિબિંબ આકાશ નું
હર પ્રહર રહેતું બદલાતું, રંગ માં,
કદી ઘેર્યું તો કદી નિરભ્ર
પ્રતિબિંબ જ...છાપ તો કદી ના છોડતું
બસ વાયુ ની લહેર માં કદી જરા ધ્રુજતું

એ જળને સૂર્યકિરણો ચમકાવી રહ્યા
જેમ રત્નો અણમોલ હો ત્યાં ભર્યાં
નિરવ છે વાતાવરણ
બસ થોડા ભ્રમર કમળે ગૂંજી રહ્યા

ત્યાંજ આવ્યું કોઈ ફરતાં ફરતાં
એ જ નિશબ્દતાને કાજ
હતા કે એના કાન તરસતાં?

ના...નહોતી આદત કદાચ એને
જળ વાયુ આભથી એક થઈ ને...
બસ એક થઈ ને,
થોડી ક્ષણો વિતાવવાની

શું કર્યું? ઉઠાવ્યો એક પથ્થર કાંઠે થી.
શું જાણવું'તુ? કેટલે દૂર જાશે એના હાથ થી?
કોણ જાણે...બસ ઉઠાવ્યો,
એ ને તાણી ફેંક્યો પાણી માં...

...છપાક...

પડ્યો તે સરોવર માં...

પાણી ઉડયું થોડું.
ઉડતાં જલબિન્દુએ ઝીલ્યાં કિરણો,
સોનેરી એ પણ ચમક્યા જરા,
ને ફરી મળી ગયા તળાવ માં.
માછલીઓ ચોંકી, તરી દૂર ગઈ,
પંખી એક અવાજ માં ચહેકી ઉડયા.

હા...એક વાત થઈ...જોયું?
એ પથ્થર પણ તો પલળ્યો,
જઈ પડ્યો જ્યારે જળ માં...
બસ જરાતરા ભીનો ન થયો,
સમાઈ ગયો એ પૂરો તળમાં.

હવે તો પાણી ની માછલીઓ
રમશે આસપાસ તરતી,
બનાવશે ઘર
એ જ પથ્થર પાછળ,
જે બની રહ્યું
અંગ નાનકડું
એ સરોવર નું,
જેમાં પડ્યો હતો એ પથ્થર...
બનાવતો વલયો
એકદા...છપાક થી.

- BhairaviParag

(One of my earlier poem in Hindi - वलय - posted elsewhere on this blog, presented again in Gujarati here)

Wednesday, September 20, 2017

Raindrops!

बारिश की बूंदें...कितनीं?


कुछ ठहरें गुलाब की दो पँखुड़िओं पर
चमकें हीरों सी नई किरणों में
महकते पलों को मन के कोनों से
फिर से जगा दें उतनीं

दो हाथ फैलाए खिड़की से
भीग जाएँ फिर थामे अंजलि में
वो भर भर जाएँ, छलके फिर
बहें मिलने धरती से उतनीं

चलते राहों पर गहराये
बादलों से गरज कर बरस पड़े
कोरा न रहे तन और मन को भी
भीगा कर हरा दें उतनीं

झरने लगें बहने कल कल कल
भर जाएँ ताल एक हो जल थल
आकाश भी मिल जाए धरती को जब
क्षितिज को धुंधला दें उतनीं

बारिश की बूंदें...उतनीं 
Raindrops...Hands-full of them
 -BhairaviParag

Monday, August 15, 2016

हे ध्वज! अजर अमर रहना

  


राष्ट्रिय शायर कहलाते ज़वेरचंद मेघाणी (1896-1947) की रचनाओं के बिना गुजराती लोकसंस्कृति का अभ्यास अधूरा है। उनकी रग रग में सौराष्ट्र की मिट्टी की सौंधी सुगंध बसी हुई थी। ग्रामीण जीवन का ऐसा चित्रण उनकी अनगिनत कविताओं, नवलकथा और लघुवार्ताओं में और लोकसाहित्य के उनके द्वारा किये गए संग्रह और विवेचन में पाया जाता है, की वे गुजरात का सांस्कृतिक इतिहास जानने में एक अनिवार्य अंग हैं। जनसेवा और स्वतन्त्रता संग्राम में भी उन्होंने अमूल्य योगदान दिया। 

प्रस्तुत अनुवादित रचना में हमें उनकी ऊर्जावान वाणी की एक ज़लक मिलती है, जिसमें उस युग के जनमनोभाव को शब्दों में व्यक्त किया गया है।

विदेशी हाथों से छुड़ाकर मातृभूमि का गौरव फिर पाने भारत के हज़ारों सपूत न्योछावर हो गए, उन्हें बल दिया एक सादगी भरे तिरंगे ने, जिसमे न थी कोई रजवाड़े की भभक, न ही सेनाबल की हुंकार थी। था तो बस धैर्य और स्नेह, जिसके बल हर वो माँ, हर वो पत्नी ने अपने सर्वस्व को देश के नाम कर दिया। उसे लहराता देखने की मोहनी ऐसी लगी, अन्य भक्ति को परे कर शीश धरने का उत्साह कोटि कोटि हृदयों में उत्पन्न हुआ। इसी ध्वज से कवि प्रेममय बिनती करते हैं, हर बलिदान का साक्षी, स्वराज्य का वह संतरी उन्हें शक्ति देता रहे। 

आज स्वराज्य के सत्तरवें वर्ष में स्वतंत्र राष्ट्र के गौरवशाली ध्वज का वंदन करते समय उसी तिरंगे के पूर्वानुगामी चरखे वाले तिरंगे ध्वज के दीवानों का स्मरण करना समयोचित है, जिनके हम कृतज्ञ हैं। आशा है मूल गुजराती काव्य का भाषांतर करने का यह विनम्र प्रयास उन भावनाओं को आप तक पहुँचा पायेगा।



ध्वज वन्दन

तेरे कितने ही प्यारोंने अमोल रक्त बहाया
पुत्रवियोगी माताओंने नयन से नीर बहाया
हे ध्वज! अजर अमर रहना
बढ़ आकाश में छाये रहना

तेरे मस्तक नहीं लिखित है गरुड़ सी मगरूरी
तेरे पर नहीं अंकित कहीं समशेर-खंजर-छुरी
हे ध्वज! दीन विहग सा
तुज उर पर चरखा प्यारा

अखिल जगत पर गूंजती नहीं त्रिशूलवती जलरानी
महाराज्य का मद प्रबोधती नहीं तुज गर्व निशानी
हे ध्वज! धीर और संतोषी
ह्रदय तेरे माँ वृद्धा बसती

नहीं किनखाब मखमल रेशम की पताका तेरी
नहीं रंगों भरी चमकदमक या सुवर्णतार की ज़री
हे ध्वज! सादगी खादी की लिए
मन कोटि कोटि तूने मोहे

परभक्षी भूदल-नौदल का नहीं तेरा कोई हुँकार
वनवासी मृग पर भय फैलाता न करे कोई शिकार
हे ध्वज! उड़ना लहराता
स्नेह समीर से सहलाता

सप्त सिंधु की अंजलि लिए समीर तुज पर फहराए
नवखंड के आशिष लिए सागर लहरें टकराएँ
हे ध्वज! जग यह थका हारा
तू एक आशा दीप है प्यारा

नील गगन से हाथ बढ़ाकर विश्वनिमंत्रण देता
पीड़ितजन से बंधूभाव का शुभसंदेश कहेता
हे ध्वज! बुलाना जग को
सारी प्रजा के लगें मेले

नील गगन से रंग पी बना उन्नत हरित तुज नैन
अरुण के केसरिया रंग अंजन कर दूजा जागेगा रैन
हे ध्वज! शशि ने है तीजा सींचा
धवल त्रिलोचन तेरा साचा

तीन नेत्रों भर तूने निहारे तुज गौरव के रखवाले
श्रीफल जैसे टकरा फूटे कई शीश ऐसे मतवाले
हे ध्वज! साक्षी बने रहना
मूक त्याग हमें रहा सहना

कोमल बाल किशोर युवा वृद्ध तेरे काज बढे आये
नर नारी निर्धन या धनी सब भेद हैं भुलाये
हे ध्वज! साक्षी बने रहना
रहा रुधिर की धार को बहना

कोई माता की खाली कोख का आज बना तू बेटा
भाल के कुमकुम मिटे जिनके, उनको तू ही बल देता
हे ध्वज! साक्षी बने रहना
सहस्त्र समर्पित का कहना

तुझको गोद ले सो रहे देखे बालक प्यारे
तेरे गीत की मस्ती में भूख प्यास बिसारे
हे ध्वज! मोहनी तेरी कैसी लगी
फ़िदा हुए तुझ पर कई जोगी

अब तक की होगी हमने अन्य की भी भक्ति
रक्तपिपासु राजाओं के तले लगाई शक्ति
हे ध्वज! नमकहलाली की
थी वह रीत गरज पुरानी

पंथ पंथ कईं की पूजा की, हरेक की ध्वजा निराली
उस पूजन पर शीश गँवाए : हाय कथा वह काली
हे ध्वज! अब वह युग है बीता
अब सकल वंदन के तुम देवता

तुम सच्चे अम कल्पतरुवर, मुक्तिफल तुज पर प्यारे
तेरी शीत सुगंध यहीं, न किसी और स्वर्ग के किनारे
हे ध्वज! युग युग तुम खिलना
सुगंध धरा पर पसारे रखना

राष्ट्रदेव के मंदिर कलश पर गहरे नाद तू लहराये
सर्वधर्म के उस रक्षक को संत सिपाही नम जाए
हे ध्वज! आज जो न भी माने
कल तुज रज शीश धरेंगे हम मानें

अष्ट प्रहर हुँकार देता जागृत उत्साही रहना
सावध रहना, पहरा देना, निद्रा न हमें आने देना
हे ध्वज! स्वराज्य के तुम रक्षक
रहे विजय ध्वनि तेरा अखंड सतत

मूल - ज़वेरचंद मेघाणी
गुजराती से हिंदी अनुवाद - भैरवी पराग आशर

Monday, May 16, 2016

सूरज कहीं नहीं जाता


People change, Situations change, Opinions change. But there's something that does not change...ever. Unshakeable, unperturbed, untouched by impermanence. Call it Knowledge, Love, or Divine...If you have ever truly known it, it is yours forever...You never lose THAT!

सूरज कहीं नहीं जाता

घिरें बादल भले, वर्षा भी तो है उसी का उपहार
जानते हम वह रहा चमकता घन के उस पार
धरती की तृषा बुझे जैसे ही 
प्रकाश से फिर नहलाता 
सूरज कहीं नहीं जाता

भले ही मुँह फेर ले धरती उससे रात अँधेरे में
क्षितिज के पार ठहरा मूर्त धैर्य सा हम जब घूमें फेरे में
तम से ज्योति की ओर दृष्टि हो जैसे ही 
नए दिन को फिर फैलाता 
सूरज कहीं नहीं जाता

जो भी है अमूल्य आलोकित जीवन में तुमने पाया 
भले छूट जाए कुछ क्षण कुछ दिन जब हो मन भरमाया 
अगर जाना है उसे मन से, भले ही अब है नकारा
जानो अनन्त समय तक हर पल वो है तुम्हारा 

भीड़भाड़ में हाथ से छूट कभी 
कंकड़ सा ठोकर भी खाता
धूल की परतें हट जाएँ 
रत्न फिर हाथ आ जाता
 
...सूरज कहीं नहीं जाता

- BhairaviParag

Quote of the moment:
"...Once you blossom then you never wither. If you move ten steps ahead, you may go back eight steps but you can never go back all ten steps..." ...(Full text here)
-Sri Sri Ravi Shankar

Wednesday, April 27, 2016

वलय

Situations do not leave a mark on a mind that is one with the vast creation, just as no images lie permanent on a mirror. Disturbances, if any, only last for a few moments, like ripples in water...and as time flies, they only add to the richness of understanding of life.

शांत जल एक सरोवर में
उस में साफ़ स्पष्ट
दिख रहा
प्रतिबिम्ब आकाश का 
हर प्रहर बदलता, बिना छाप छोड़े
हवा से ज़रा सा कभी कभी कांपते 
उस पानी को सूर्य की किरणें चमका रहीं 
जैसे रत्न झिलमिलाते रहते

नीरव है वातावरण
बस कुछ पंछी ही उड़ रहे
 
तभी कोई आया टहलता 
उसी निःशब्दता की तलाश में

शायद आदत नहीं थी उसे
जल से आकाश से एक हो कर 
बस एक हो कर कुछ देर बैठने की
उठाया एक
पत्थर किनारे से
क्या देखना था...कितनी दूर जाता है?
पता नहीं...बस उठाया
तानकर फैका पानी में

...छपाक... 
जा गिरा सरोवर में
पानी उड़ा थोडा
उड़ती बूँदें भी ज़रा सी चमकीं धुप में
फिर मिल गयीं ताल में
मछलियाँ चौंकीं, तैर दूर गयीं
पक्षी भी उड़े एक आवाज़ दे कर
जल में कुछ वलय बने
फ़ैल कर कुछ बड़े बन
फिर मिल गए समतल में
झिलमिलाते आसमानी दर्पण के 
 
हाँ, एक बात तो है
वह पत्थर भी तो गीला हो गया
जब गिरा जल में
बस गीला ही नहीं
डूब गया है पूरा ही
पानी में, बैठ गया तल में

अब पानी की मछलियाँ
खेलेंगी आसपास, तैरती हुईं
बनाएँगी घर उसी पत्थर के पीछे
इस तालाब का छोटा सा
एक हिस्सा ही बन गया
वह पत्थर जो गिरा
एक बार....छपाक से
 
-BhairaviParag

Friday, November 27, 2015

धूप में एक फूल

सूर्य खिला है आसमान में 
धुप सुनहरी है लाया 
विश्व सारा दिख रहा है उजला
साफ़ साफ़ हर कण दिखलाया

उद्यम में लगा जग सारा
प्रकाश को गले लगाया
सुवासित श्वेत शतदल सुमन
कहीं कुञ्ज में था, दिख न पाया 

तप्त हुआ वातावरण
लौ का जैसे बादल लहराया 
पुष्प दल से नमी लगी उड़ने
रंग भी ज़रा सा कुम्हलाया 

पर वही गर्म हवा
कभी शीतल पवन थी, जब था साया
जो जाना था ह्रदय से 
उसे अनदेखा न कर पाया

तृषा कई दिनों की थी बुझी
जब पवन था वर्षा लाया 
उन्हीं पंखों पर आया था जल
बन ओस किरणों को था चमकाया

समय बदल गया है, देखो,
बात हमारी भी मानो 
संभल जाओ, जी जाओगे
पत्तों ने बहुत समझाया

दाह लगा हुआ था पर
शीतलता भूल न पाया
फूल कभी कंटक बन न पाया
क्या करे, मुरझा गया 

-BhairaviParag 



Saturday, August 08, 2015

The Tale of a Tree

After reading "THE MANGO TREE'


First stanza (emphasized)  idea courtesy - friend Ashish Khandeparkar's poem ‘THE MANGO TREE’, which I rephrased here, summarizing it in 4 lines.
Inspired by that tale of letting go, I extended the thread as a story of change & growth. 


The gifts we receive – all our talents, wealth, knowledge become a burden if we fail to share them with the world around us. Any possessions are of no value if they bind us down. Letting go of ego, when we become light and open to the life around us, we in turn become a vehicle for goodness in life, an instrument of the divine. As one who gives, gets more and more, to be passed on in turn. And that makes a complete person, grown to his full potential, bright and beautiful, and loved by all.

A Mango Tree was with fruits weighed down,
Gave away sweet treasure it possessed
For comfort brought by sharing all you own
is precious than any wealth, it expressed.

In freedom new, tree sang and danced
with breeze and rains and birds that flew.
Flowers then blossomed, Gave a chance
to grow and gift again fresh fruits new.

As seasons changed the tree rejoiced
the letting go of wealth, be light.
For sweetest boons it became the choice
like flute hollow plays notes just right

As years passed by, tree grew to be
a shelter giving shade hope and rest
for the passersby who could well see
a life well-lived in times that test.

-BhairaviParag

Tuesday, July 07, 2015

You Rise In Love

You rise in love.
So much, that you come
eye to eye
with the creator
And what else
but just marvel
at the creation
Your loved one is...

You rise in love.
So much, that any faults
of the loved one
seem like specs of dust
and are cleared away
Just with one breeze
of the breath
the loved one breathes...

You rise in love.
So much, that you
command the clouds
to reside in your eyes
dark and deep
any marks of hurt
Just a drop or two
wash away with ease...

You rise in love.
So much, that the sun
shines on your heart
and storms pass
but you are untouched
warm and bright
As you are loved too
your heart at peace...

You rise in love.
So much, you are now
tall as a mountain
So steadfast, unshakable,
if the whole earth of
past and present vibrates, 
you are a shelter
calm, safe. All worries cease.

No. You don't fall in Love...
You Rise in Love.
-BhairaviParag

Friday, June 26, 2015

चरणचिह्न

एक विनम्र प्रयास - 
कवि श्री 'सुन्दरम् ' द्वारा सन १९५८ में  रचित गुजराती कविता 'चरणचिह्न' का भावानुवाद

रूप का मैं रसिक तो रहा पर तृषा मेरी अरूप के लिए
भज रहा मैं अविरत मूर्त है जो कभी मिले अमूर्त इसलिए
शब्दों को पुकार पुकार मैं नित्य ढूंढ रहा अशब्द ही
सदा चलता रहता मिल जाये कदा मुझे स्थिरता कहीं

रे आओ आओ मुझ पास ऐ उस पार के निवासी
धन्य हो वो एक पल बस तेरी मिल जाए हे प्रवासी
सिमटी रहे भले सकल तेरी कला, मेरी बस याचना
एक दृष्टि तेरी मुझ ओर हो जाए, यही है प्रार्थना

यह जीवन-मृत्यु की इस जग में बनी सुन्दर फुलवारी
यहाँ पुष्प और कंटक के द्वंद्व की नित्य अद्भुत यारी
यहाँ पृथ्वी पर देवों का अमृत घट कभी दिखा ना
ना ही यहाँ देखी कभी स्वर्गपुष्प की चिरंजीव माला

मैं तो रात रात भर तारे अगिनत देखता जागूँ
बस इस बेला में चरणचिह्न ही तेरे मैं मांगूँ 
(मूल कविता 'सुन्दरम्' के काव्यसंग्रह प्रियंका से)
-BhairaviParag


 

Thursday, June 11, 2015

कुछ पल साथ तेरे

मुस्कुरा उठेगी मेरे सामने एक रोज़
तेरी तस्वीर एक सितारा,
चाँद बन कर जगा हूँ...
कुछ पल साथ तेरे बीता पाऊं यारा,
हर दुआ में यही मैं मांगने लगा हूँ

तुझ से फिर मिलने की चाह दिल में है ऐसे
धड़कन के साथ ज़िन्दगी जुड़ी जैसे
हर साँस ऐसी, तेरी खुश्बू से महके
उस एक झलक के सहारे जीने लगा हूँ...
कुछ पल साथ तेरे...

बस एक बार मिल लो, फिर चाहे खो जाना
एक नज़र देख लोगे, संजो लूंगा खज़ाना
गर हाथ मेरा एक पल तुम थाम लोगे
जन्नत के बदले नसीब ऐसा चाहने लगा हूँ...
 कुछ पल साथ तेरे...

उस एक पल में मैं सारी उम्र जी लूँगा
हर गम से नज़ाद पाने तरकीब सीख लूँगा
रूह मेरी जिन आँखों में देखी है मैंने
उन से आँखे मिलाने तरसने लगा हूँ... 
कुछ पल साथ तेरे...

एक आवाज़ दे दो, या इस राह गुज़रो
या फिर भीड़ में ही सुकून बन के संवरो
थकने लगी आँखें, न होतीं अब नम ये
खुली पलकों से सपने मैं देखने लगा हूँ
हर चेहरे में अब तुम्हें ढूँढने लगा हूँ...

कुछ पल साथ तेरे बीता पाऊं यारा
हर दुआ में यही मैं मांगने लगा हूँ। 
 -BhairaviParag

Monday, June 08, 2015

It's beautiful, feeling blue

Every experience adds meaning to our life,though we may not realize it then. The beauty lies in discovering it. Feeling Blue then turns to feeling the depth that sensitivity brings, once the pain melts away


It's beautiful, feeling the sky


of vast understanding
of infinite possibilities, yes, to fly

of wet heavy raindrops
blending with a ray of light
that splits to reveal a bow
its glorious colours true

of hiding million stars
in the light of the day
of letting them shine
only when it's dark

It's beautiful, felling blue, 
like the sky

It's beautiful, feeling the ocean


of deep meanings,
of million waves, yes, even turbulent

of nestling many islands
lush green with sweetest water
where to play in the sands
and basking in sun new

of hiding million pearls
in the closed oyster shells
of letting them reveal
themselves to true seeker

It's beautiful, feeling blue,
like the ocean 

It's beautiful, feeling The Blue

 

when the mind is in the refuge 
of the melodious flute 
of the sunny robes
of feather light many-hued
with heart soft as butter.
Yes, It's beautiful then,
feeling, even blue.
 - BhairaviParag