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Thursday, August 14, 2025

શ્રાવણભાદો (છંદકાવ્ય)

બે વર્ષ પર સુવૃત્તતિલકમ્ ગ્રન્થના અભ્યાસથી પુનઃ જાગૃત થયેલ છંદોબદ્ધ કાવ્યો પ્રત્યે અહોભાવ, સુજલા-સુફલા ભૂમિ ભારતવર્ષમાં વર્ષાઋતુનો ઘનશ્યામ-હરિત વૈભવ, ભક્તિભીનાં  ઉત્સવોનું આગમન, એ પર રાગ મલ્હારમાં સુસજ્જ અનેક ગીતો મ્યુઝિક એપ પર સાંભળતા જામેલો રંગ. 
છન્દપરિચય - 
આ કાવ્ય એક સિંહનો ચાલ સમો લહેકો ધરાવતા કર્ણપ્રિય શાર્દુલવિક્રીડિત છંદમાં રચાયો છે.
અક્ષરમેળ છંદ એવા શાર્દુલવિક્રીડિતનું બંધારણ છે - 
દરેક પંક્તિમાં મ સ જ સ | ત ત ગા 
અર્થાત્, ૧૯ અક્ષર, જેમાં યતિ (વિરામ) ૧૨મા અક્ષરે; જેથી,
ગુરુ ગુરુ ગુરુ લઘુ લઘુ ગુરુ લઘુ ગુરુ લઘુ લઘુ લઘુ ગુરુ ,
ગુરુ ગુરુ લઘુ ગુરુ ગુરુ લઘુ ગુરુ.
આ ગોઠવણીમાં દરેક પંક્તિ સજ્જ થાય છે.
આ છંદમાં જ આપણા સૌનું જાણીતું ઉદાહરણ છે સરસ્વતીવંદના
या कुन्देन्दुतुषारहारधवला या शुभ्रवस्त्रावृता
या वीणावरदण्डमण्डितकरा या श्वेतपद्मासना ।
या ब्रह्माच्युत शंकरप्रभृतिभिर्देवैः सदा वन्दिता
सा मां पातु सरस्वती भगवती निःशेषजाड्यापहा ॥
તેમ જ સૌ વૈષ્ણવોને અતિ પ્રિય પ્રાતઃસ્મરણ
श्रीगोवर्धननाथपादयुगलं हैयंगवीनप्रियम्।
नित्यं श्री मधुराधिपं सुखकरं श्रीविट्ठलेशं मुदा॥
श्रीमद् द्वारवतीश गोकुलपति श्रीगोकुलेन्दुं विभुं ।
श्रीमन्मन्मथमोहनं नटवरं श्रीबालकृष्णं भजे ॥ ...
તદુપરાંત વિવાહપ્રસંગે ગવાતું મંગલાચરણ...
એ જ રીતે ગેય છે વર્ષાઋતુ વર્ણવતી પ્રસ્તુત કવિતા - 

શ્રાવણ-ભાદો
(શાર્દુલવિક્રીડિત)

જો, તો! આ રસબિન્દુ વાદળ તણાં મોતી સમા શોભતાં!
વર્ષે છે નભથી અમી મન ભરી પૃથ્વીતૃષા વારવા.
ખેડૂતો પણ વાવણી ઝટ કરી, વન્દે કરો જોડતાં,
લ્હેરાવે ધન શીતલા તુ સુફલા માતા ધરા શ્યામલા!

વૃક્ષો રેલમછેલ નંદનવને ભીંજાય, લીલાં થતાં.
કો કન્યા સુકુમાર ગાન કરતી, હિંડોલમાં મ્હાલતી.
નાનાં બાળ જળે છપાક કરતાં દીસે હસી નાચતાં,
જાણે લાલન ગોપનાં જ રમતાં હો ગોકુલે કાનુડા!

સંતોષી ખગ મોર ચાતક ઘણાં, ને સૌ મૃગોને હવે
ના કો ચિંતન હો ક્ષુધા-તરસનું, ભંડાર છે ઘાસનાં.
દૃશ્યો શ્રાવણમાં સુભાદ્રપદમાં આવાં દિસે ભાવતાં,
ગુંજે સુસ્વરમાં ગણેશભજનો, ને કીર્તનો શ્યામનાં!

- ભૈરવીપરાગ

Wednesday, September 20, 2017

Raindrops!

बारिश की बूंदें...कितनीं?


कुछ ठहरें गुलाब की दो पँखुड़िओं पर
चमकें हीरों सी नई किरणों में
महकते पलों को मन के कोनों से
फिर से जगा दें उतनीं

दो हाथ फैलाए खिड़की से
भीग जाएँ फिर थामे अंजलि में
वो भर भर जाएँ, छलके फिर
बहें मिलने धरती से उतनीं

चलते राहों पर गहराये
बादलों से गरज कर बरस पड़े
कोरा न रहे तन और मन को भी
भीगा कर हरा दें उतनीं

झरने लगें बहने कल कल कल
भर जाएँ ताल एक हो जल थल
आकाश भी मिल जाए धरती को जब
क्षितिज को धुंधला दें उतनीं

बारिश की बूंदें...उतनीं 
Raindrops...Hands-full of them
 -BhairaviParag

Wednesday, April 27, 2016

वलय

Situations do not leave a mark on a mind that is one with the vast creation, just as no images lie permanent on a mirror. Disturbances, if any, only last for a few moments, like ripples in water...and as time flies, they only add to the richness of understanding of life.

शांत जल एक सरोवर में
उस में साफ़ स्पष्ट
दिख रहा
प्रतिबिम्ब आकाश का 
हर प्रहर बदलता, बिना छाप छोड़े
हवा से ज़रा सा कभी कभी कांपते 
उस पानी को सूर्य की किरणें चमका रहीं 
जैसे रत्न झिलमिलाते रहते

नीरव है वातावरण
बस कुछ पंछी ही उड़ रहे
 
तभी कोई आया टहलता 
उसी निःशब्दता की तलाश में

शायद आदत नहीं थी उसे
जल से आकाश से एक हो कर 
बस एक हो कर कुछ देर बैठने की
उठाया एक
पत्थर किनारे से
क्या देखना था...कितनी दूर जाता है?
पता नहीं...बस उठाया
तानकर फैका पानी में

...छपाक... 
जा गिरा सरोवर में
पानी उड़ा थोडा
उड़ती बूँदें भी ज़रा सी चमकीं धुप में
फिर मिल गयीं ताल में
मछलियाँ चौंकीं, तैर दूर गयीं
पक्षी भी उड़े एक आवाज़ दे कर
जल में कुछ वलय बने
फ़ैल कर कुछ बड़े बन
फिर मिल गए समतल में
झिलमिलाते आसमानी दर्पण के 
 
हाँ, एक बात तो है
वह पत्थर भी तो गीला हो गया
जब गिरा जल में
बस गीला ही नहीं
डूब गया है पूरा ही
पानी में, बैठ गया तल में

अब पानी की मछलियाँ
खेलेंगी आसपास, तैरती हुईं
बनाएँगी घर उसी पत्थर के पीछे
इस तालाब का छोटा सा
एक हिस्सा ही बन गया
वह पत्थर जो गिरा
एक बार....छपाक से
 
-BhairaviParag

Sunday, February 01, 2015

मैं बारिश में गीला गीला हो गया

घर से निकला, माँ ने छाता नहीं दिया था
पता नहीं था, बादल ने क्या सोच लिया था 
ठंडा ठंडा मैं, वो नीला नीला हो गया 
मैं बारिश में गिला गिला हो गया 


बारिश की बूँदें मेरी नाक पर नाचतीं 
कुछ तो तूफानी, कान के भीतर भी जातीं 
पाँव मेरा कीचड से चिपकिला हो गया 
मैं बारिश में गिला गिला हो गया 

पेड़ सारे नए हरे भरे हो गए 
पानी में नहाकर साफ़ सुथरे हो गए
रास्ता सारा ज़रने सा रसीला हो गया
मैं बारिश में गिला गिला हो गया 

घर पहुंचा तब तक एक छींक आ गयी 
स्कूल में कल छुट्टी होगी, उम्मीद छा गयी
पर हल्दी वाले दूध से फिर स्फुर्तीला हो गया 
मैं बारिश में गीला गीला हो गया
- BhairaviParag 
(Written in partnership with my 9 y o son, 
who gave the original idea and many lines, too)


Wednesday, September 17, 2014

Poetry from the wild

A picture says a thousand words, just as few words can paint a picture.

Seeing some compelling visual poetry in these pictures from the wildlife, words came in couplets, to accompany them.

Sharing a small selection of my captions for these beauties.


Those eyes...Hypnotic

नज़र मिल जाए एकबार फिर वो हट सकती नहीं जाने कितनी बातें यह न बोल कर भी कह रहीं दिल से इन आँखों की तसवीर मिट सकती नहीं

The extravagance of colours...

सातों रंग बिखेरता बड़ी शान से जब वह उड़ा 
आसमाँ में सूरज भी एक पल थम दिया मुस्कुरा  





The royal calmness...

ऐसा क्या सुन्दर स्वप्न रहा, न आँख खुलीं न तन चंचल शुभ्र धवल शीत हिमवर्षा में शांत सुन्दर व्याघ्र अचल



The lightness of being...

उड़ जाना है अगले पल यह फूल झड़ जाएगा कल मीठा रस लेकर, ख़ुशी के रंग तू बिखेरता चल


And the coolness of homecoming.

सारी दुनिया घूम ली, ऊंचाईयाँ हर छू लीं

लौटा, आई घरकी याद, आज एक अरसे के बाद
भूला चेहरा दर्पण में दिखा, शांत शीतलता मिली

Thursday, July 31, 2014

श्रावण

श्याम घन छाए अम्बर पर,
चहु ओर छाई हरियाली,
टप टप थिरकत जल की बूंदें,
पत्तों की हथेली पर देत ताली

शीतल पवन झुला रहा झूला,
झूल रही बाला भोली भाली,
ठेक देत तृण भरी धरती पर,
फिर झूले ऊंचे, हँसे, उड़े निराली

भीग गया तन और अंतर मन,
नाच उठी अल्हड़ मतवाली
पनिहारी,चलत जो जा रही पनघट,
थम कर, खो गयीं अँखियाँ दो काली

श्रावण की प्रिय घटा ऐसी छाई,
मन का हर संशय हो रहा खाली
जा, गयी आँगन वह सांवरे के,
लता रही अब घेरे वृक्ष की डाली

-BhairaviParag

Friday, February 14, 2014

A flight within



Travel. Such a beautiful experience. Be it within or without. 

Even when we are back in our routine, sometimes the expansion, the joy, the freedom you have experienced when exploring the wonderful places comes back to you...rushing. The moments when you have felt one with the nature around you...when you felt as expansive as sky, deep as ocean, steady as a mountain, accepting as earth, flowing as spring water through sun and shade. The Travels then  travel within...

Words can not capture the beauty, but can go as close as one can be sensitive...The beauty of magnificent lion king in the wild Gir, or children playing on flowery lawns in Kashmir...The adventure of leaving the paved road and exploring the trail on a hill, setting each step carefully, barefoot, taking slippery chappals in hand...revisiting history stored in the stones of a fort or wall paintings in a palace...now not inhabited, with changing times...

And what compares to the thrill of swinging higher and higher ( When it is allowed for grown-ups in vacation spots :)) ... otherwise the real kids have monopoly) and treasuring the laughs to remember later...

Yes...all this can come rushing back to you any moment, as it did at 1.30am in night, some 3-4 months back, and a poem flows through you, taking shape in a matter of minutes...and you sit up and jot down with pencil on the last page the first book that your hand catches, in messiest possible handwriting! :-))

Dreamy, i know... Crazy, I agree...Enjoy, anyway... :-)

I Wonder...when I will write something like this again...

यादों की एक उड़ान

एक सागर, एक पर्वत, एक आसमान है मुझ में
एक धरती, एक नदिया , धुप और छाँव इस मन में

शब्दों के जंगल में अर्थों के मोती
हिरणों कि आँखें अश्रु सँजोती...


झरने की छन छन , किरणों का स्मित
बादल कि ममता, पवन की प्रीत


शैशव के संगीत को तिनकों का ताल
सूखे पत्तों पर सिंह की चाल

रात का कम्बल, सपनों का रथ,

छोटी सी पहाड़ी पर ढूंढे है पथ

इतिहास के पन्नों में पत्ते के महल,

गौरव कि गाथा में नियति कि हलचल

झूलों का चेतन , अनुभूति का भान
चलते चलते एक भर ली उड़ान