Monday, August 15, 2016

हे ध्वज! अजर अमर रहना

  


राष्ट्रिय शायर कहलाते ज़वेरचंद मेघाणी (1896-1947) की रचनाओं के बिना गुजराती लोकसंस्कृति का अभ्यास अधूरा है। उनकी रग रग में सौराष्ट्र की मिट्टी की सौंधी सुगंध बसी हुई थी। ग्रामीण जीवन का ऐसा चित्रण उनकी अनगिनत कविताओं, नवलकथा और लघुवार्ताओं में और लोकसाहित्य के उनके द्वारा किये गए संग्रह और विवेचन में पाया जाता है, की वे गुजरात का सांस्कृतिक इतिहास जानने में एक अनिवार्य अंग हैं। जनसेवा और स्वतन्त्रता संग्राम में भी उन्होंने अमूल्य योगदान दिया। 

प्रस्तुत अनुवादित रचना में हमें उनकी ऊर्जावान वाणी की एक ज़लक मिलती है, जिसमें उस युग के जनमनोभाव को शब्दों में व्यक्त किया गया है।

विदेशी हाथों से छुड़ाकर मातृभूमि का गौरव फिर पाने भारत के हज़ारों सपूत न्योछावर हो गए, उन्हें बल दिया एक सादगी भरे तिरंगे ने, जिसमे न थी कोई रजवाड़े की भभक, न ही सेनाबल की हुंकार थी। था तो बस धैर्य और स्नेह, जिसके बल हर वो माँ, हर वो पत्नी ने अपने सर्वस्व को देश के नाम कर दिया। उसे लहराता देखने की मोहनी ऐसी लगी, अन्य भक्ति को परे कर शीश धरने का उत्साह कोटि कोटि हृदयों में उत्पन्न हुआ। इसी ध्वज से कवि प्रेममय बिनती करते हैं, हर बलिदान का साक्षी, स्वराज्य का वह संतरी उन्हें शक्ति देता रहे। 

आज स्वराज्य के सत्तरवें वर्ष में स्वतंत्र राष्ट्र के गौरवशाली ध्वज का वंदन करते समय उसी तिरंगे के पूर्वानुगामी चरखे वाले तिरंगे ध्वज के दीवानों का स्मरण करना समयोचित है, जिनके हम कृतज्ञ हैं। आशा है मूल गुजराती काव्य का भाषांतर करने का यह विनम्र प्रयास उन भावनाओं को आप तक पहुँचा पायेगा।



ध्वज वन्दन

तेरे कितने ही प्यारोंने अमोल रक्त बहाया
पुत्रवियोगी माताओंने नयन से नीर बहाया
हे ध्वज! अजर अमर रहना
बढ़ आकाश में छाये रहना

तेरे मस्तक नहीं लिखित है गरुड़ सी मगरूरी
तेरे पर नहीं अंकित कहीं समशेर-खंजर-छुरी
हे ध्वज! दीन विहग सा
तुज उर पर चरखा प्यारा

अखिल जगत पर गूंजती नहीं त्रिशूलवती जलरानी
महाराज्य का मद प्रबोधती नहीं तुज गर्व निशानी
हे ध्वज! धीर और संतोषी
ह्रदय तेरे माँ वृद्धा बसती

नहीं किनखाब मखमल रेशम की पताका तेरी
नहीं रंगों भरी चमकदमक या सुवर्णतार की ज़री
हे ध्वज! सादगी खादी की लिए
मन कोटि कोटि तूने मोहे

परभक्षी भूदल-नौदल का नहीं तेरा कोई हुँकार
वनवासी मृग पर भय फैलाता न करे कोई शिकार
हे ध्वज! उड़ना लहराता
स्नेह समीर से सहलाता

सप्त सिंधु की अंजलि लिए समीर तुज पर फहराए
नवखंड के आशिष लिए सागर लहरें टकराएँ
हे ध्वज! जग यह थका हारा
तू एक आशा दीप है प्यारा

नील गगन से हाथ बढ़ाकर विश्वनिमंत्रण देता
पीड़ितजन से बंधूभाव का शुभसंदेश कहेता
हे ध्वज! बुलाना जग को
सारी प्रजा के लगें मेले

नील गगन से रंग पी बना उन्नत हरित तुज नैन
अरुण के केसरिया रंग अंजन कर दूजा जागेगा रैन
हे ध्वज! शशि ने है तीजा सींचा
धवल त्रिलोचन तेरा साचा

तीन नेत्रों भर तूने निहारे तुज गौरव के रखवाले
श्रीफल जैसे टकरा फूटे कई शीश ऐसे मतवाले
हे ध्वज! साक्षी बने रहना
मूक त्याग हमें रहा सहना

कोमल बाल किशोर युवा वृद्ध तेरे काज बढे आये
नर नारी निर्धन या धनी सब भेद हैं भुलाये
हे ध्वज! साक्षी बने रहना
रहा रुधिर की धार को बहना

कोई माता की खाली कोख का आज बना तू बेटा
भाल के कुमकुम मिटे जिनके, उनको तू ही बल देता
हे ध्वज! साक्षी बने रहना
सहस्त्र समर्पित का कहना

तुझको गोद ले सो रहे देखे बालक प्यारे
तेरे गीत की मस्ती में भूख प्यास बिसारे
हे ध्वज! मोहनी तेरी कैसी लगी
फ़िदा हुए तुझ पर कई जोगी

अब तक की होगी हमने अन्य की भी भक्ति
रक्तपिपासु राजाओं के तले लगाई शक्ति
हे ध्वज! नमकहलाली की
थी वह रीत गरज पुरानी

पंथ पंथ कईं की पूजा की, हरेक की ध्वजा निराली
उस पूजन पर शीश गँवाए : हाय कथा वह काली
हे ध्वज! अब वह युग है बीता
अब सकल वंदन के तुम देवता

तुम सच्चे अम कल्पतरुवर, मुक्तिफल तुज पर प्यारे
तेरी शीत सुगंध यहीं, न किसी और स्वर्ग के किनारे
हे ध्वज! युग युग तुम खिलना
सुगंध धरा पर पसारे रखना

राष्ट्रदेव के मंदिर कलश पर गहरे नाद तू लहराये
सर्वधर्म के उस रक्षक को संत सिपाही नम जाए
हे ध्वज! आज जो न भी माने
कल तुज रज शीश धरेंगे हम मानें

अष्ट प्रहर हुँकार देता जागृत उत्साही रहना
सावध रहना, पहरा देना, निद्रा न हमें आने देना
हे ध्वज! स्वराज्य के तुम रक्षक
रहे विजय ध्वनि तेरा अखंड सतत

मूल - ज़वेरचंद मेघाणी
गुजराती से हिंदी अनुवाद - भैरवी पराग आशर

Monday, May 16, 2016

सूरज कहीं नहीं जाता


People change, Situations change, Opinions change. But there's something that does not change...ever. Unshakeable, unperturbed, untouched by impermanence. Call it Knowledge, Love, or Divine...If you have ever truly known it, it is yours forever...You never lose THAT!

सूरज कहीं नहीं जाता

घिरें बादल भले, वर्षा भी तो है उसी का उपहार
जानते हम वह रहा चमकता घन के उस पार
धरती की तृषा बुझे जैसे ही 
प्रकाश से फिर नहलाता 
सूरज कहीं नहीं जाता

भले ही मुँह फेर ले धरती उससे रात अँधेरे में
क्षितिज के पार ठहरा मूर्त धैर्य सा हम जब घूमें फेरे में
तम से ज्योति की ओर दृष्टि हो जैसे ही 
नए दिन को फिर फैलाता 
सूरज कहीं नहीं जाता

जो भी है अमूल्य आलोकित जीवन में तुमने पाया 
भले छूट जाए कुछ क्षण कुछ दिन जब हो मन भरमाया 
अगर जाना है उसे मन से, भले ही अब है नकारा
जानो अनन्त समय तक हर पल वो है तुम्हारा 

भीड़भाड़ में हाथ से छूट कभी 
कंकड़ सा ठोकर भी खाता
धूल की परतें हट जाएँ 
रत्न फिर हाथ आ जाता
 
...सूरज कहीं नहीं जाता

- BhairaviParag

Quote of the moment:
"...Once you blossom then you never wither. If you move ten steps ahead, you may go back eight steps but you can never go back all ten steps..." ...(Full text here)
-Sri Sri Ravi Shankar

Wednesday, April 27, 2016

वलय

Situations do not leave a mark on a mind that is one with the vast creation, just as no images lie permanent on a mirror. Disturbances, if any, only last for a few moments, like ripples in water...and as time flies, they only add to the richness of understanding of life.

शांत जल एक सरोवर में
उस में साफ़ स्पष्ट
दिख रहा
प्रतिबिम्ब आकाश का 
हर प्रहर बदलता, बिना छाप छोड़े
हवा से ज़रा सा कभी कभी कांपते 
उस पानी को सूर्य की किरणें चमका रहीं 
जैसे रत्न झिलमिलाते रहते

नीरव है वातावरण
बस कुछ पंछी ही उड़ रहे
 
तभी कोई आया टहलता 
उसी निःशब्दता की तलाश में

शायद आदत नहीं थी उसे
जल से आकाश से एक हो कर 
बस एक हो कर कुछ देर बैठने की
उठाया एक
पत्थर किनारे से
क्या देखना था...कितनी दूर जाता है?
पता नहीं...बस उठाया
तानकर फैका पानी में

...छपाक... 
जा गिरा सरोवर में
पानी उड़ा थोडा
उड़ती बूँदें भी ज़रा सी चमकीं धुप में
फिर मिल गयीं ताल में
मछलियाँ चौंकीं, तैर दूर गयीं
पक्षी भी उड़े एक आवाज़ दे कर
जल में कुछ वलय बने
फ़ैल कर कुछ बड़े बन
फिर मिल गए समतल में
झिलमिलाते आसमानी दर्पण के 
 
हाँ, एक बात तो है
वह पत्थर भी तो गीला हो गया
जब गिरा जल में
बस गीला ही नहीं
डूब गया है पूरा ही
पानी में, बैठ गया तल में

अब पानी की मछलियाँ
खेलेंगी आसपास, तैरती हुईं
बनाएँगी घर उसी पत्थर के पीछे
इस तालाब का छोटा सा
एक हिस्सा ही बन गया
वह पत्थर जो गिरा
एक बार....छपाक से
 
-BhairaviParag

Friday, November 27, 2015

धूप में एक फूल

सूर्य खिला है आसमान में 
धुप सुनहरी है लाया 
विश्व सारा दिख रहा है उजला
साफ़ साफ़ हर कण दिखलाया

उद्यम में लगा जग सारा
प्रकाश को गले लगाया
सुवासित श्वेत शतदल सुमन
कहीं कुञ्ज में था, दिख न पाया 

तप्त हुआ वातावरण
लौ का जैसे बादल लहराया 
पुष्प दल से नमी लगी उड़ने
रंग भी ज़रा सा कुम्हलाया 

पर वही गर्म हवा
कभी शीतल पवन थी, जब था साया
जो जाना था ह्रदय से 
उसे अनदेखा न कर पाया

तृषा कई दिनों की थी बुझी
जब पवन था वर्षा लाया 
उन्हीं पंखों पर आया था जल
बन ओस किरणों को था चमकाया

समय बदल गया है, देखो,
बात हमारी भी मानो 
संभल जाओ, जी जाओगे
पत्तों ने बहुत समझाया

दाह लगा हुआ था पर
शीतलता भूल न पाया
फूल कभी कंटक बन न पाया
क्या करे, मुरझा गया 

-BhairaviParag 



Saturday, August 08, 2015

The Tale of a Tree

After reading "THE MANGO TREE'


First stanza (emphasized)  idea courtesy - friend Ashish Khandeparkar's poem ‘THE MANGO TREE’, which I rephrased here, summarizing it in 4 lines.
Inspired by that tale of letting go, I extended the thread as a story of change & growth. 


The gifts we receive – all our talents, wealth, knowledge become a burden if we fail to share them with the world around us. Any possessions are of no value if they bind us down. Letting go of ego, when we become light and open to the life around us, we in turn become a vehicle for goodness in life, an instrument of the divine. As one who gives, gets more and more, to be passed on in turn. And that makes a complete person, grown to his full potential, bright and beautiful, and loved by all.

A Mango Tree was with fruits weighed down,
Gave away sweet treasure it possessed
For comfort brought by sharing all you own
is precious than any wealth, it expressed.

In freedom new, tree sang and danced
with breeze and rains and birds that flew.
Flowers then blossomed, Gave a chance
to grow and gift again fresh fruits new.

As seasons changed the tree rejoiced
the letting go of wealth, be light.
For sweetest boons it became the choice
like flute hollow plays notes just right

As years passed by, tree grew to be
a shelter giving shade hope and rest
for the passersby who could well see
a life well-lived in times that test.

-BhairaviParag