Sunday, September 07, 2014

मेरे घर चाँद क्यों नहीं आता?


मेरे घर चाँद क्यों नहीं आता?
क्या वह मुझे नहीं पहचानता?
रोज़ रात चमकता  रहता 
जैसे हो मुझे वह आवाज़ देता 

पर जब काले बादल आते 
उनके पीछे क्यों छिप जाता 
आँख मिचौली खेलते उन तारों से 
क्या मैं  हूँ  कम  टिमटिमाता ?

पूरी समझ उसे खा जाऊंगा...
क्या ऐसा है मुझे समझता?
या फिर मेरे घर की बिल्ली 
की म्याऊँ से है वह डरता?

जब वह छोटा पतला दिखता 
उसकी ध्यान रखूं, मन करता 
और जब पूरा गोल-मटोल हो,
लगता उस पर कन्हैया खेलता 

मुझे भी खेलने क्यों न बुलाता?
ऐसे क्यों है मुझे सताता?
कितना हूँ मैं उसे मनाता 
फिर भी रहता मुझे चिढ़ाता 

मेरे घर चाँद क्यों नहीं आता? 

- BhairaviParag 
(In teamwork with my dear son)





Thursday, August 21, 2014

नाज़ है

                   जाना जब से है उन्हें, ये जिंदगी बढ़ सी गयी,
               दिन हर एक रंगे उन से, दिल में याद उनकी रही 
बोल दें जो बातें गहरी, सोचने ये दिल लगे,
बादल सब जाएँ बिखर, आसान हर मुश्किल लगे.


चलने लगें राह पर जब, सौ आँखें उन पर रुकें,
हँस दें जब वो खिलखिला, या धीरे से पलकें झुकें

नज़र मिला अपना बनाएँ, लाखों की वे जान हैं,
गम हो कम जब पास वो हों, खुशियों की पहचान हैं
दिल वो सुनता है इस दिल की, जाना सा चेहरा भी है,
नाज़ है खुद पर, उनके वक़्त पर, थोडा हक मेरा भी है


-BhairaviParag
(Note: Wrote & first posted this a year ago, in August2014. Re-posting the same after some time-gap, on the occasion on GuruPoornima today, 31/07/2015.)


Thursday, July 31, 2014

श्रावण

श्याम घन छाए अम्बर पर,
चहु ओर छाई हरियाली,
टप टप थिरकत जल की बूंदें,
पत्तों की हथेली पर देत ताली

शीतल पवन झुला रहा झूला,
झूल रही बाला भोली भाली,
ठेक देत तृण भरी धरती पर,
फिर झूले ऊंचे, हँसे, उड़े निराली

भीग गया तन और अंतर मन,
नाच उठी अल्हड़ मतवाली
पनिहारी,चलत जो जा रही पनघट,
थम कर, खो गयीं अँखियाँ दो काली

श्रावण की प्रिय घटा ऐसी छाई,
मन का हर संशय हो रहा खाली
जा, गयी आँगन वह सांवरे के,
लता रही अब घेरे वृक्ष की डाली

-BhairaviParag

Friday, July 25, 2014

हर रंग के गीत सजायेंगे

एक हँसी, एक आस, आँखों की नमी
एक आंधी, एक सागर, खुला आसमाँ
तुम से कुछ न छुपायेंगे

किस पुकार को सुन उठी मन में सिसक,

किस ताल को सुन गए पाँव थिरक,
किन आँखों में दिखी अपनी ही ज़लक...
हर याद से नाता निभाएंगे

वह फूल खिला, उसने क्या कहा,

जो हवा चली, क्या इशारा कर गयी,
बूंदों ने बरस कुछ गुनगुनाया,
तुम्हें भी गा कर सुनायेंगे...

खुली किताब में सजे जो शब्द,

फूलों सी महक फैला हैं रहे,
बरसेंगे वो फूल, समेट के उन को
नव रंग कई हार बनायेंगे

जिसने है बनायी ये दुनिया सकल,

जिसने इस मन को बनाया कोमल,
जिसने किया लिखना यह गीत सरल,
उसे ही कर अर्पण मुस्कायेंगे

Wednesday, July 16, 2014

जियो

जियो तो ऐसे जियो, दिल से
जो कोई मिले बोल उठे...
"क्या जी रहे हो यार
जीवन हो तो हो ऐसा

बादल घिरे हैं घने हर तरफ
कहाँ से चमकी यह किरण
जिसका आइना बना तुम्हारा चेहरा
उजाला वो भी फैला रहा

कुछ कह दिया तुम्हें किसी ने
मैंने भी सुना, था कुछ रुखा सा
तुम रूठे तो नहीं, बरसा रहे
फिर भी अपनापन ही उतना

उत्सव हो जिस दिन,
तुम्हारे साथ और खिल उठा
मेला लगा हर दिन खुशियों का
क्यों खोजें मीत मिलने को बहाना

खुल के ली साँस, गलती जो की भी, तो नयी
भरी उड़ान सितारे छूने को
न भी मिले जो तारे, चाँद तो छुआ
'काश यह किया होता' तो न  कहा

बाँटा जो था मीठा हमेशा
जो कुछ परोसा गया खट्टा तीखा
साँसों से हल्का कर दिया,
आँखों से लगा अपना लिया"

और फिर एक दिन… 

"तुम जा रहे लम्बे सफ़र पर
पता है खुश ही रहोगे हर जहाँ
मिलेगा कोई, जिस से बात करते
खिलेगा दिल, पहचान लेंगे तु ही लौट आया"

-BhairaviParag 

Loved this :)